कामसूत्र के बारे में कुछ अनसुनी बाते जिन्हें आप नही जानते है ?

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कामसूत्र के बारे में कुछ अनसुनी बाते जिन्हें आप नही जानते है
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यहां इस संबंध में संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। सेक्स या काम को सभी धर्मों में वर्जित विषय माना गया है, लेकिन प्रचीनकाल में भारत में इसकी शिक्षा का प्रचलन था। हिन्दू धर्म के चार सिद्धांत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से काम के कई अर्थ हैं। काम संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है आनंद की इच्छा या आकांक्षा, कामना और सुखी जीवन। काम को सीधे तौर पर संभोग या सेक्स ही समझा जाता है जबकि इसका व्यापक अर्थ है। हिंदुओं के प्रेम के देवता कामदेव के नाम से इस शब्द की उत्पत्ति मानी गई है।


क्या है कामशास्त्र :  भारतीय कामशास्त्र काम अर्थात संभोग और प्रेम करने की कला का शास्त्र है। कहते हैं कि नंदी ने भगवान शंकर और पार्वती के पवित्र प्रेम के संवादों को सुनकर कामशास्त्र लिखा। नंदी नाम का बैल भगवान शंकर का वाहन माना जाता है। क्या कोई बैल एक हजार अध्यायों का शास्त्र लिख सकता है? हमारे जो तंत्र के जानकार हैं उनका मानना है कि सिद्ध आत्मा के लिए शरीर के आकार का महत्व नहीं रह जाता।
 कामशास्त्र के अधिक विस्तृत होने के कारण आचार्य श्वेतकेतु ने इसको संक्षिप्त रूप लिखा, लेकिन वह ग्रंथ भी काफी बड़ा था अतः महर्षि ब्राभव्य ने ग्रन्थ का पुनः संक्षिप्तिकरण कर उसे एक सौ पचास अध्यायों में सीमित एवं व्यवस्थित कर दिया। बाद में इसी शास्त्र को महर्षि वात्स्यायन ने क्रमबद्ध रूप से लिखा। कहते हैं कि आचार्य चाणक्य ने ही वात्स्यायन नाम से यह ग्रंथ लिखा था।
क्या है कामसूत्र : महर्षि वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की। इसे विश्व का प्रथम यौन शिक्षा ग्रंथ माना जाता है। कामसूत्र के रचनाकार का मानना है कि दाम्पत्य उल्लास एवं संतृप्ति के लिए यौन-क्रीड़ा आवश्यक है। वास्तव में सेक्स ही दाम्पत्य सुख-शांति की आधारशिला है। काम के सम्मोहन के कारण ही स्त्री-पुरुष विवाह सूत्र में बंधने का तय करते हैं।
अतः विवाहित जीवन में काम के आनन्द की निरन्तर अनुभूति होते रहना ही कामसूत्र का उद्देश्य है। जानकार लोग यह सलाह देते हैं कि विवाह पूर्व कामशास्त्र और कामसूत्र को नि:संकोच पढ़ना चाहिए, लेकिन विवाहपूर्व सेक्स का अनुभव लेना दांपत्य जीवन को समाप्त करने वाला सिद्ध होता है।
कामसूत्र के आसनों का नाम : आचार्य बाभ्रव्य ने कुल सात आसन बताए हैं- 1. उत्फुल्लक, 2. विजृम्भितक, 3. इंद्राणिक, 4. संपुटक, 5. पीड़ितक, 6. वेष्टितक, 7. बाड़वक।
आचार्य सुवर्णनाभ ने दस आसन बताए हैं: 1.भुग्नक, 2.जृम्भितक, 3.उत्पी‍ड़ितक, 4.अर्धपीड़ितक, 5.वेणुदारितक, 6.शूलाचितक, 7.कार्कटक, 8.पीड़ितक, 9.पद्मासन और 10. परावृत्तक।
आचार्य वात्स्यायन के आसन : विचित्र आसन : 1.स्थिररत, 2.अवलम्बितक, 3.धेनुक, 4.संघाटक, 5.गोयूथिक, 6.शूलाचितक, 7.जृम्भितक और 8.वेष्टितक।
अन्य आसन : 1.उत्फुल्लक, 2.विजृम्भितक, 3.इंद्राणिक, 4. संपुटक, 5. पीड़ितक, 6.बाड़वक 7. भुग्नक 8.उत्पी‍ड़ितक, 9. अर्धपीड़ितक, 10.वेणुदारितक, 11. कार्कटक 12. परावृत्तक आसन 13. द्वितल और 14. व्यायत। कुल 22 आसन होते हैं।
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